भारत का वह प्रसिद्ध रसायनशास्त्री, जो मामूली धातु को बना देता था सोना

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रसायन विज्ञान और धातु विज्ञान का भारत से बहुत ही प्राचीन सम्बंध है, जिसका इतिहास 3 हज़ार साल से भी पुराना माना जाता है। अगर आप ऐतिहासिक चीजों को देखने के शौकीन हैं, तो आपने भारत में मौजूद ऐसी बहुत-सी चीजें देखी होंगे जो सालों साल पुरानी हैं लेकिन उनकी बनावट में कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं आया है।

इसी तरह अगर आप दिल्ली के महरौली में मौजूद कुतुब मीनार में बने “लौह स्तंभ” को देखेंगे, तो पाएंगे कि उसमें आज तक जंक नहीं लगा है। जबकि यह लौह स्तंभ 1600 साल पुराना है और सदियों से धूप, बारिश समेत भारत के हर बदलते मौसम का सामना कर रहा है।

लौह स्तंभ

ऐसे में क्या आपके मन में भारत के रसायन और धातु विज्ञान को जानने की जिज्ञासा नहीं होती है, जो हजारों साल पुराना है और उसके सबूत आज भी देखने को मिलते हैं। आज हम आपको प्राचीन भारत के प्रमुख धातुकर्मी और रसायनशास्त्री (Chemist) नागार्जुन (Nagarjuna) के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनका इतिहास में अहम योगदान है।

भारत के प्राचीन रसायनशास्त्री नागार्जुन (Nagarjuna)

ऐतिहासिक दस्तावेजों की मानें तो नागार्जुन (Nagarjuna) का जन्म 10वीं शताब्दी में शुरुआत में गुजरात के दहाक गाँव में हुआ था, जिसका ज़िक्र 11वीं शताब्दी में दर्ज अल-बिरूनी के किंवदंतियों में मिलता है। वहीं अगर चीनी और तिब्बती साहित्य की मानें तो नागार्जुन का जन्म वैदेह देश (विदर्भ) में हुआ था, जिसके बाद वह सातवाहन वंश से जुड़ गए थे।

नागार्जुन ने महज़ 11 साल की उम्र में ही रसायन शास्त्र से जुड़े शोध कार्य शुरू कर दिए थे, जिसके परिणास्वरूप वह भारत के सबसे चर्चित रसायनशास्त्री बनने में कामयाब हो गए। कहा जाता है कि नागार्जुन के पास इतना ज्ञान था कि वह मामूली-सी धातु को सोने में बदलने की क्षमता रखते थे।

यूं तो नागार्जुन एक बहुत बड़े राजघराने से सम्बंध रखते थे, लेकिन राज्य की देखरेख के बजाय उनका पूरा ध्यान शोध कार्यों में लगा रहता था। नागार्जुन ने अमृत और पारस जैसे रत्नों की खोज करने के लिए महल में ही एक बहुत बड़ी लैब का निर्माण किया था, जिसमें उन्होंने काफ़ी सारे आविष्कार भी किए थे।

लैब में शोध कार्यों की बदौलत ही नागार्जन ने धातुओं को सोने में बदलने की प्रक्रिया विधि खोज निकाली थी, इसके अलावा उन्होंने पारे को शुद्ध करने की विधि भी बनाई थी। नागार्जुन ने ऐसी औषधियों की खोज करने में कामयाबी हासिल की थी, जिससे लाइलाज बीमारी को भी ठीक किया जा सकता था।

रसयान शास्त्र पर लिखी कई पुस्तकें

आज स्कूल और कॉलेजों में छात्र कैमिस्ट्री की जिन पुस्तकों को पढ़ते हैं, उनमें मौजूद जानकारी प्रसिद्ध रसायनशास्त्री नागार्जुन की ही देन है। उन्होंने रसायन शास्त्र और धातु विज्ञान पर विभिन्न शोध कार्य किए, इसी दौरान नागार्जुन ने इन विषयों से जुड़ी कई पुस्तकों की रचना भी की थी।

नागार्जुन की प्रसिद्ध पुस्तकों में से रस रत्नाकर और रसेंद्र मंगल का काम शामिल हैं, जिन्हें पढ़कर धातुकारों नें विभिन्न धातुओं को शुद्ध करने की विधि सीखी थी। इतना ही नहीं रस रत्नाकर पुस्तक में नागार्जुन ने दूसरी धातुओं से सोना बनाने की विधि के बारे में भी विस्तार से लिखा है।

अमरता की खोज करना चाहते थे नागार्जुन

वो कहते हैं न कि जब किसी व्यक्ति को अपनी खोज और आविष्कारों पर यक़ीन हो जाता है, तो हर उस प्रयोग को पूरा करना चाहता है जिसके बारे में आम लोग सिर्फ़ बातचीत की कर सकते हैं। ऐसा ही एक प्रयोग था अमरता की खोज, जिससे मनुष्य मृत्यु को मात दे सकता है।

रसायन शास्त्र और धातु विज्ञान की कई विधियों और औषधियों को खोजने के बाद नागार्जुन अमर होने वाली चीजों की खोज में जुट गए, ताकि मनुष्य के जीवन काल को बढ़ाने का उपाय मिल सके। इसी कार्य को पूरा करने की कोशिश में नागार्जुन दिन रात लैब में प्रयोग करने लगे, जिसकी वज़ह से उनके राज्य में अव्यवस्था बढ़ने लगी।

नागार्जुन के पुत्र ने उन्हें राज्य की परिस्थितियों को ठीक करने और राज्य पर ध्यान देने के लिए कहा, लेकिन उन्होंने अपने पुत्र की बात यह कहकर टाल दी कि वह अमरता की दवा खोज रहे हैं। नागार्जुन के पुत्र ने यह बात अपने दोस्तों को बता दी कि उनके पिता अमर होने वाली दवा का निर्माण कर रहे हैं।

धोखे से नागार्जुन से मारा गया था

इस तरह नागार्जुन के लैब से यह बात पहले महल में फैली और फिर देखते ही देखते पूरे राज्य में अमरता की दवा का निर्माण किए जाने का चर्चा होने लगा। जब नागार्जुन के दुश्मन को इस बात की जानकारी हुई, तो उन्होंने धोखे से नागार्जुन को मार दिया गया। ताकि मनुष्य को अमर बनाने वाली दवा की खोज न की जा सके, इसके साथ दुश्मनों ने उनकी लैब को भी पूरी तरह से नष्ट कर दिया था।

एक छोटी की गलती की वज़ह से भारत के प्रसिद्ध रसायन शास्त्री और धातु विज्ञानी नागार्जुन की मृत्यु हो गई, जिसकी वज़ह से उनका अमरता वाला आखिरी शोध भी अधूरा रह गया। हालांकि नागार्जुन ने जाते-जाते भारत को धातुओं को शुद्ध करने की ऐसी-ऐसी जानकारी दी, जिसकी बदौलत लोहे से लेकर सोने तक की विभिन्न चीजों को सदियों तक खराब होने से बचाया जा सकता है।