खेती में फ़ायदा देख नौकरी छोड़ बने किसान, शुरू की अमरुद की खेती

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खेती के तरफ आए दिन लोगों की रूचि बढ़ रही है। हर रोज़ ऐसी कई कहानियाँ सुनने को मिल जातीं हैं जहाँ युवा अच्छी खासी नौकरी छोड़ कृषि कार्य में लग जाते हैं। इस लिस्ट में अब एक और नाम शामिल हो गया है। हरयाणा के सॉफ्टवेयर इंजीनियर नीरज ढांढा अपनी अच्छी ख़ासी नौकरी छोर कर अब आर्गेनिक फार्मिंग के तरफ मुड़ गए हैं। नीरज 2-3 दिन तक ताज़े रहने वाले अमरुद की इस प्रकार से खेती कर रहे हैं कि यह 15 दिन तक ताजे रहते हैं। इतना ही नहीं इन अमरूदों की मांग ऑनलाइन मार्केट में इतनी ज्यादा है कि इन्हें वह ₹550 प्रति किलो के हिसाब से बेच कर मुनाफ़ा कमा रहें हैं।

नीरज का जन्म हरियाणा में जींद जिले के संगतपुरा गांव में एक किसान परिवार में हुआ था। हालांकि उनके परिवार में कोई नहीं चाहता था कि वह किसान बने। पर नीरज को शुरू से लगता था की वो कृषि क्षेत्र में ज्यादा अच्छा कर सकतें हैं। नीरज ने बेटर इंडिया को दिए इंटरव्यू में कहा था “मैं इस तथ्य से हमेशा चकित रहूँगा कि एक किसान सिर्फ एक बीज से सैकड़ों बीज बना सकता है। क्या आपने कहीं अधिक लाभदायक व्यवसाय देखा है? लेकिन तब मैं यह समझने के लिए बहुत छोटा था कि किसान दिन-ब-दिन गरीब क्यों होते जा रहे थे, ”

हालाँकि नीरज का परिवार उनके किसान बनने की इक्षा के खिलाफ था। इसलिए नीरज सॉफ्टवेयर की दुनिया में बसने की कोशिश करते रहें। हालाँकि, जब वो काम कर रहे थे तो, उसमें उसकी रुचि की कमी के कारण, उन्होंने जो सॉफ्टवेयर कंपनी शुरू की, उसे काफी नुकसान उठाना पड़ा। 2004 में, नीरज ने आखिरकार अपनी अच्छी तनख्वाह वाली नौकरी छोड़ने और पूर्णकालिक खेती करने का फैसला कर लिया था।

असफल हुए थे पहले प्रयास में

नीरज पढ़ाई में भी काफ़ी अच्छे थे और प्रारंभिक पढ़ाई के बाद कंप्यूटर साइंस इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। पढ़ाई पूरी होने के बाद वह नौकरी करने लगे परंतु उनके अंदर कहीं ना कहीं की खेती करने की भावना घर कर चुकी थी। इसके लिए वह पैसे बचाने लगे और जब कुछ पैसे इकट्ठे हो गए तो जींद से 7 किलोमीटर आगे संगतपुरा में 7 एकड़ ज़मीन में चेरी की खेती की। परंतु उनका यह प्रयास असफल हो गया तो घर वालों ने उन्हें सलाह दी कि वो दोबारा नौकरी कर लें। पर इसके बाद नीरज अमरुद की खेती का मन बा चुके थे।

उनके अमरुद की फसल काफी अच्छी हुई पर जब वो इसे बाज़ार में बेचने गए तो इनके फल ₹7 प्रति किलो के हिसाब से बिकें। इसके जवाब में नीरज ने गाँव और शहर से सटे 6 काउंटर लगाए और यहाँ अमरुद दोगुने दाम पर बिक गए। इतना ही नहीं काउंटरों के जरिए थोक विक्रेता भी सीधे उनके खेतों तक पहुँचने लगे थें।

अमरुद के जल्दी ख़राब होने की थी चिंता

अब नीरज को चिंता थी की यह फल 2-3 दिनों में ख़राब हो जाते थे। इसके लिए उन्होंने एक प्रयोग करने का सोंचा, जिसके लिए वह छत्तीसगढ़ गए और वहाँ नर्सरी से थाईलैंड के ‘जम्म्बो ग्वावा’ के पौधे खरीदें और अपने खेत में लगा दिया। इसमें उन्होंने बहुत मेहनत किया और पोषण के लिए जैविक खाद का इस्तेमाल किया जिसका परिणाम यह हुआ कि उनके खेत के अमरुद वज़न में एक से डेढ़ किलो तक के और स्वाद और मीठापन में इलाहाबादी अमरूद के हुए। इन अमरूदों की मांग काफी ज्यादा बढ़ने लगी। इसके बाद वह अपनी कंपनी बनाकर हाईवे बेल्ट पर इन अमरूदों को ऑनलाइन बेचने लगें, जिसकी क़ीमत ₹550 प्रति किलो रखी थी। यह अमरुद 10 से 15 दिनों तक ताजी रहती थी जो ग्राहकों को काफ़ी आकर्षित करने लगी थी।

नीरज के इस प्रयास की हम सराहना करते हैं। इस्पे नीरज का कहना है कि उनकी आने वाली पीढ़ी अब नौकरी के बजाय खेती में अपना भविष्य देखेगी।