पेट पालने के लिए करते थे किया करते थे बाल मजदूरी, अब हैं करोड़ो के मालिक

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जिंदगी में लोगों को अकसर ऐसे मोड़ पर ले आती है जहां इंसान को आगे बढ़ने के लिए रास्ता ही नहीं दिखते हैं। इन संघर्षो में कुछ लोग या तो हार मान लेते हैं तो लोग ऐसा कुछ कर दिखाते हैं जिसकी जितनी मिसालें दो कम है। आज आपसे हम एक ऐसे व्यक्ति की कहानी शेयर करंगे जिन्होंने अपने कठिन समय में हार नहीं मानी और कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ते गए। भंवरलाल आर्य के संघर्ष की कहानी न सिर्फ़ आगे बढ़ने को प्रेरित करती है बल्कि खराब से ख़राब समय में हौंसला बांधने की हिम्मत भी देती है।

आज के समय में आराम दायक जिंदगी बिता रहे भंवरलाल आर्य राजस्थान के रहने वाले हैं। आज उनके पास किसी चीज की कमी नहीं है। लेकिन भंवरलाल की ज़िन्दगी हमेशा से इतनी संपन्न और समृद्धि भरी नहीं थी। पर उन्हें धन दौलत अपने पूर्वजों से मिली है। भंवरलाल आर्य ने अपनी ज़िन्दगी में ऐसे समय को देखा है, जब भूख लगने पर, उसे मिटाने के लिए उनके पास खाना तक नहीं होता था। भंवरलाल आर्य ने अपनी जिंदगी में बचपन से ही आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा है। इसके कारण से उन्हें पेट भरने के लिए मजदूरी तरह करनी पड़ी। लेकिन भंवरलाल आर्य ने हालातों के आगे घुटने नहीं टेके और न ही हार मानी, उन्होंने इतनी मेहनत और संघर्ष किया कि आज लोग उनसे प्रेरणा लेते हैं।

भंवरलाल का परिचय

भंवरलाल आर्य का जन्म 1 जून 1969 में राजस्थान के कल्याणपुर तहसील के ढाणी में हुआ था। भंवरलाल आर्य के परिवार बहुत गरीब था। उनके माता पिता को पानी भरने के लिए घर से 7-8 किमी दूर तक जाना परता था। भंवरलाल के पिता नहीं चाहते थे कि उनके बच्चे को ग़रीबी का सामना करना पड़े, इसलिए उन्होंने भंवरलाल आर्य और उनके भाई बहन को उनके नानी घर भेज दिया था। भंवरलाल आर्य 12 साल की उम्र तक अपनी नानी के साथ रहे और वहीं 5वीं कक्षा तक पढ़ाई की थी। इसके बाद भंवरलाल की दुनिया परिवर्तित हो गई।

जब भंवरलाल को अपने घर की परिस्थिति का एहसास हुआ तो उन्होंने 12 साल की उम्र से जगह जगह काम खोजना शुरू कर दिया। इसके लिए उन्होंने राजस्थान के अलग-अलग इलाकों में काम की तलाश की, लेकिन उनके हाथ कुछ नहीं लगा।

इसके बाद भंवरलाल आर्य ने काम की तलाश में मुंबई जैसे बड़े शहर का रूख किया और दो वक़्त की रोटी कमाने के लिए मजदूरी करने लगे। महज़ 12 साल की उम्र में ही भंवरलाल आर्य ने मुंबई समेत कोलकाता और बैंगलोर जैसे बड़े-बड़े शहरों में मजदूरी की और अपने परिवार की आर्थित स्थिति ठीक करने की कोशिश में लग गए।

जगह जगह काम करने के बाद भंवरलाल कर्णाटक गए और वहां एक सेठ ने उनको काम पर रख लिया। शुरुआत में सेठ दुकान में काम करने के बदले भंवरलाल आर्य को रहने के लिए घर, खाना और कपड़े की सुविधा देता था, लेकिन बाद में सेठ ने आर्थिक ज़रूरतों के साथ भंवरलाल को हर महीने 50 रुपए सैलरी देना शुरू कर दिया। संघ की दुकान में काम करे के साथ भंवरलाल संघ से जुड़ गए। संघ के सदस्यों से मिलने और उनके जीवन प्रसंग सुनने के साथ-साथ भंवरलाल आर्य ने कई जगह अलग-अलग नौकरियाँ भी की, जिसकी बदौलत उनकी जान पहचान बढ़ती चली गई। कई सालों तक संघ के साथ जुड़े रहने और नौकरी करने के बाद भंवरलाल आर्य ने फ़ैसला किया कि वह अपना काम शुरू करेंगे।

महज़ 30 हज़ार रुपयों से उन्होंने अपना कारोबार शुरू किया। सिर्फ एक साल के भीतर उन्होंने 1 लाख का मुनाफा कमाया। इस मुआफी के बाद साल 1990 में उन्होंने दूसरी दुकान खोली। 2001 आते आते भंवरलाल आर्य कपड़ों के व्यापारिक क्षेत्र में एक सफल नाम बन चुके थे। इसके बाद उन्होंने राजीव दीक्षित द्वारा शुरू किए गए आजादी बचाओ आंदोलन में हिस्सा लिया। भंवरलाल आर्य ने कई स्कूलों, मंदिरों और अस्पतालों का निर्माण भी करवाया, ताकि आम जनता का कल्याण हो सके।

इतने संघर्षो के बाद मजदूरी करने वाला बालक करोड़पति बन गया। जिंदगी के भाग दौड़ में वो अस्थमा पीड़ित हो गए। कई तरह की इलाज करवाने के बाद कोई ख़ास असर नहीं होने उन्होंने योग कर अपनी बीमारी को ठीक करंगे।
यक़ीनन भंवरलाल की कहानी से कई लोग प्रेरित हुए है। अगर आप अपनी ग़रीबी और हालातों से बाहर निकलना चाहते हैं, तो संघर्ष करें। यकीनन कभी न कभी आपको कामयाबी ज़रूर हासिल होगी।