केले के कचरे से कमाई कर करोड़पति बने 8वीं पास, अब दे रहे सैकड़ों लोगों को रोजगार

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आपने पैसे कमाने के कई सरे तरीके सुने होंगे पर कभी सुना है की इंसान कचरा बेच रहा है ? इतना ही नहीं कभी किसी को कचरा बेचकर करोड़पति बनते हुए देखा या सुन है ? यह बात आपको हास्यपद लग रही हो पर कचरे को रिसाइकल करके फिर उपयोग करने का चलन हर बीते दिन बढ़ते जा रहा है। इसके कई फायदे हैं जैसे की इससे कमाई तो होती है साथ ही पर्यावरण भी संरक्षित होता है। कचरा रिसाइकिल, निस्तारण, कचरे से ऊर्जा उत्पादन करके कचरे का प्रबंधन होता है। दुनिया भर में एनवीरोमेंटलिस्ट कचरा प्रबंधन पर ज़ोर दे रहें हैं। इस विषय में उठाया जा रहा हर कदम फायदेमंद साबित होता है। ऐसे इसीलिए क्योकि कचरे को रीसायकल करने में ज्यादा पैसे नहीं लगते वही अन्य सभी वस्तुओं को बनाने के लिए कच्चा माल चाहिए होता है और उसके लिए पैसे लगते हैं। आज आपको एक ऐसे व्यक्ति के बारे में बताने जा रहे हैं जो केले के कचरे को रीसायकल कर करोड़ों रुपए कमा रहे हैं।

तो यह कहानी है तमिलनाडु के मदुरै के मेलाक्कल गाँव के रहने वाले पीएम मुरुगेसन की। मुरुगसेन ने स्कूल से ड्रॉपआउट ले लिया था यानि उन्होंने स्कूल बिच में ही छोड़ दिया था। आज उन्होंने जिन्होंने केले के कचरे के उपयोग से करोड़ों रुपए कमा लिए और सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गए हैं। मुरुगसेन केले के कचरे से बैग, टोकरी आदि बनाकर बेचते हैं। अगर आज की बात करें तो सैकड़ों वे व्यक्तियों को रोजगार भी दे रहे हैं। इतना ही नहीं, मुरुगेसन ने केले के फाइबर से रस्सी बनाने के काम को सरल व प्रभावशाली बनाने के लिए एक मशीन का भी आविष्कार किया। जिसकी सहायता से केले के कचरे से मज़बूत रस्सी भी बनाई जा सकती है। अब तो उनके द्वारा तैयार किए गए प्रोडक्ट विदेशों में भी निर्यात किए जा रहे हैं।

क्यों छोड़ी पढ़ाई

जैसा की हमने बताया कि मुरुगसेन स्कूल ड्रॉपआउट हैं, उन्होंने कक्षा 8वीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी। मुरुगेसन ने बताया की कि “खेती में अपने पिताजी की सहायता करने के लिए मैं आठवीं कक्षा के बाद नहीं पढ़ पाया था और घर की आर्थिंक हालत ठीक न होने की वज़ह से मैं आगे भी पढ़ाई नहीं कर पाया।” चूँकि मुरुगसेन का परिवार खेती करता था, कक्षा 8वीं से उन्होंने अपने पिताजी के साथ खेती का काम शुरू कर दिया था। उन्होंने बचपन से ही खेती से जुडी असफलताएं देखीं थी। हालाँकि राज्य का कृषि विभाग भी उनकी सहायता कर रहा था लेकिन फिर भी खेती के काम में ज्यादा कमाई नहीं होती थी। इसी बीच में वो कुछ और काम करने का सोचने लगे।

कैसे आया यह आईडिया

खेती की असफलता और कुछ और करने के लगन के बिच एक दिन मुरुगसेन ने अपने गाँव में ही एक व्यक्ति को फूलों की माला बनाते समय धागे की जगह केले के फाइबर का उपयोग करते हुए देखा, तो उनको केले के कचरे से अलग अलग चीज़े बनाकर बेचने का ख़्याल आया। हालांकि केले के पेड़ के पत्ते, तना और फल आदि सब का उपयोग हो जाता है परंतु, इसके तने से उतरने वाली दो सबसे बाहरी छाल कचरे में चली जाती है। इन छालों को जला दिया जाता है या तो ‘लैंडफिल’ के लिए भेज दिया जाता है। ऐसे में यह काम थोड़ा कठिन था पर मुरुगसेन ने इससे ही अपना व्यवसाय शुरू करने का निश्चय कर लिया।

केले के कचरे से रस्सी बनाने के लिए बनाई मशीन

मुरुगसेन ने साल 2008 में अपने परिवार के सहयोग से केले के पौधे के कचरे से रस्सी बनाने का काम शुरू किया था। जिसके लिए पहले तो उन्होंने नारियल की छाल से रस्सियाँ बनाने के लिए जो मशीन इस्तेमाल होती है उसमें केले का कचरा डाला उन्हें लगा कि इससे काम बन जाएगा और केले की रस्सी बनकर तैयार होगी। परंतु ऐसा नहीं हो पाया। वे बताते हैं कि “मैंने नारियल की छाल को प्रोसेस करने वाली मशीन पर केले के फाइबर की प्रोसेसिंग ट्राई की। यहाँ काम नहीं बना लेकिन मुझे, एक उपाय मिला।”

फिर इसके बाद मुरुगेसन ने केले के फाइबर की प्रोसेसिंग मशीन बनाने के लिए बहुत बार प्रयास किया। फल स्वरूप वर्ष 2017 में उन्होंने पुरानी साइकिल की रिम और पुल्ली का इस्तेमाल करके एक ‘स्पिनिंग डिवाइस’ बनाया। जो बहुत किफायती भी था। इस मशीन से केले के कचरे की कताई हो जाती थी।इस मशीन को व प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद से अफसर देखने आए और उन्हें मशीन बहुत पसंद आई। संस्था के ऑफिसर्स ने उस इलाके के दूसरे किसानों को भी कहा कि वे भी इस प्रकार की मशीन उपयोग करें। इससे मुरुगेसन का आत्मविश्वास और बढ़ा तो उन्होंने अपनी मशीन को और ज़्यादा बेहतर बनाने के लिए 1.5 लाख रुपए का निवेश किया तथा उसे अपने नाम से पेटेंट करवा लिया।

अब तक मुरुगसेन को कई पुरुस्कारों से नवाज़ा जा चुका है

आत्मनिर्भर बनने सोच रखते हुए उसी रस्ते पर चल पड़े हैं मुरुगेसन। उन्होंने 5 लोगों के साथ मिलकर यह काम शुरू किया था और अब वह 300 से ज़्यादा लोगों को रोजगार दे रहे हैं। उनके व्यवसाय ‘एमएस रोप प्रोडक्शन सेंटर के द्वारा महिलाओं को भी रोजगार मिल रहा है। इतना ही नहीं ख़ास बात तो यह है कि कई महिलाएँ अपने घर पर ही रह कर अपने फ्री टाइम में काम कर रहीं हैं। उनके वर्क सेंटर से महिलाएँ उनसे कच्चा माल घर ले जाती हैं और फिर अपने घर पर ही रह टोकरी, चटाई, बैग इत्यादि वस्तुएँ बनाकर वहाँ पहुँचाती हैं।

मुरुगसेन को उनके आविष्कार और कार्यों के लिए 7 राष्ट्रीय और राज्य स्तर के सम्मानों से नवाजा गया है। सरकार के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय के तहत खादी विकास और ग्रामोद्योग आयोग द्वारा ‘पीएमईजीपी’ अवॉर्ड से उन्हें सम्मानित किया गया है। इतना ही नहीं, उनको केंद्रीय कृषि मंत्रालय से ‘राष्ट्रीय किसान वैज्ञानिक पुरस्कार’ और जबलपुर में कृषि विज्ञान केंद्र से ‘सर्वश्रेष्ठ उद्यमी पुरस्कार’ भी नवाज़ा गया है।