कभी सुनती थी गांव वालों के ताने, आज उसी कीवी की खेती से कमा रहीं लाखों रूपए

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1987

इंसान के दृढ़ विश्वास से बढ़ के कुछ नहीं होता। मनुष्य की सच्ची मेहनत लगन और हिम्मत के सामने रास्ता कितना भी मुश्किल क्यों न हो वो अपनी मंजिल तक पहुच ही जाता है। ऐसे तो मेहनत और लगन पर किताबों में कई सारी कहावतें लिखीं हुईं हैं। इन कहावतों और मुहावरों से प्रेरित कुछ लोग अपने हौसलों के दम पर इन्हें असलियत में बदल देते हैं।

कुछ ऐसा ही किस्सा है उत्तराखंड निवासी एक महिला किसान का। सीता देवी ने पारंपरिक खेती छोड़ विदेश फल कीवी की खेती करने के बारे में सोचा और शुरू भी किया। इस नए तरीके में न केवल वो सफल हुईं बल्कि अच्छी खासी कमाई भी कर रहीं हैं। इतना ही नहीं उनके गांव वाले उनको अब कीवी क्वीन कह कर संबोधित करते हैं।

कीवी क्वीन की कहानी

सीता देवी उत्तराखंड के टिहरी जिले में दुवाकोटी नामक एक छोटा-सा गाँव की निवासी हैं। यह देश का ऐसा इलाका है जहाँ लोग ज्यादातर पारंपरिक खेती को बढ़ावा देते हैं।  पारंपरिक खेती के तहत लोग ज्यादातर सबिजयां या अनाज ही उगाते हैं। ऐसे में इस गांव की रहने वाली सीता देवी पारंपरिक तरीका छोड़ कुछ नया करने का सोचा और उन्होंने कीवी की खेती शुरू की।

उत्तराखंड के टिहरी जिले में दुवाकोटी नामक एक छोटा-सा गाँव मौजूद है, जहाँ ज्यादातर लोग पारंपरिक खेती के तहत सब्जी और अनाज उगाते हैं। लेकिन इस गाँव में रहने वाली सीता देवी ने दूसरों से कुछ अलग करने का फ़ैसला किया और कीवी की खेती शुरू कर दी।

इस नए तरीके की शुरुआत में सीता देवी को कीवी की फ़सल उगाने में बहुत दिक्कतों का सामना करना पड़ा था। उनकी परेशानियों को देख उनके गांव वाले उनका मजाक बनाया करते थे और उनपर हस्ते थे। की लोगों ने उन्हें ताने भी मारे पर अंत में उनकी मेहनत रंग लाई।

क्यों छोड़ी पारंपरिक खेती

सीता देवी पहले अपने खेतों में आलू, मटर और टमाटर जैसी सब्जियों की खेती किया करती थ।  उनके लगाए हुए फसलों को जंगली जानवर और बंदर आकर मगर तहस नहस कर देते है। इसी वजह से उन्हें काफी नुकसान सहन करना पड़ता था। यही कारण है कि उन्होंने सब्जियों की खेती करना बंद कर दिया।

पर अपनी आजीविका के लिए उन्हें कुछ न कुछ खाद्य पदार्थ की खेती करनी ही थी। इसी दौरान उन्हें विभाग द्वारा आयोजित कीवी प्रोत्साहन योजना के बारे में जानकारी मिली। इसके अलावा उन्हें पता चला कि जानवर कीवी की फसल को नुकसान नहीं पहुँचाते हैं। अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए वे सीधा उद्यान विभाग के दफ्तर पहुँच गई। वहाँ उन्हें बागीचा तैयार करने और कीवी की फ़सल उगाने सम्बंधी सभी जानकारी मिल गई।

कीवी की खेती के बारे में जानकारी लेने के बाद उन्होंने हिमाचल प्रदेश से इस फल को उगाने के लिए ट्रेनिंग भी ली। हिमाचल प्रदेश से ट्रेनिंगपूरी कर वापिस लौट कर सीता देवी ने जब खेती शुरू की तब गाँव वालों के तानों और मजाक का सामना करना पड़ा। कई लोगों ने उन्हें कहा कि पहाड़ों पर ऐसी फ़सल पैदा होना असंभव है, इसलिए उनकी मेहनत खराब हो जाएगी। गाओं वालों द्वारा डिमोटिवेट होने के बावजूद सीता देवी ने ट्रेनिंग में बताई गई हर बात का ध्यान रखा और प्रशिक्षण के हिसाब से कीवी के पौधों की खेती शुरू कर दी। उन्होंने जब ठान लिया था कि वो गाँव वालों की बातों का जवाब कीवी की फ़सल उगा कर देगी और वह ऐसा करने में कामयाब भी हुई।

सीता देवी के लिए यह कीवी की खेती करना और उसकी देखभाल करना अकेले आसान नहीं था। सीता जी ने बताया की इस काम में उनके परिवार ने भी उनकी मदद की। आपको सीता देवी के पति पेशे से एक ड्राइवर हैं और मैक्स गाड़ी चलाकर पर सवारी और सामान लाने ले जाने का काम करते हैं। सीता देवी के दो बेटे हैं, जिनमें से एक बेटा ड्राइविंग करता है जबकि छोटा बेटा बारहवी पास करने के बाद कंप्यूटर कोर्स कर रहा है।