शराबी पिता के चलते लोग ताना मारते थे, मां ने मजदूरी कर पढ़ाया, बेटा पहले IPS फिर बना IAS

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आज हम आपको एक ऐसे आईएएस ऑफिसर की कहानी के बारे में बताने वाले है जिन्होंने गरीबी मुश्किलों और समाज को मात दे कर अपने मुकाम को हासिल किया था हम बात कर रहे है राजेन्द्र भारूड़ जब वह अपनी मां के गर्भ में थे, तब पिता का साया सिर से उठ गया था।

7 जनवरी 1988 को सकरी तालुका के छोटे से गाँव सादु तालुका में जन्मे डॉ राजेंद्र, बंधु भरुद और कमलाबाई के तीन बच्चों में से दूसरे हैं। उन्होंने बताया की आज तक उन्हें नहीं पता कि उनके पिता कैसे दिखते थे उनका निधन राजेंद्र के पैदा होने से पहले ही हो गया था।

कई लोगों ने राजेंद्र की माँ से अबॉर्शन कराने को कहा पर उन्होंने इनकार कर दिया। मां जब देसी शराब बेचती थी तब वह 2-3 साल के था। राजेंद्र कहते है ‘मैं रोता था तो शराबियों को दिक्कत होती थी। इसलिए वो दो चार-बूंद शराब मेरे मुंह में डाल देते और मैं चुप हो जाता था।’ राजेंद्र की माँ के अलावा उनका इस दुनिया में कोई और नहीं था। तीन भाई-बहनों और मां के सिर पर रहने को छत तक नहीं थी।

सिर्फ दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं। उनकी माँ ने अपना तथा परिवार को चलने के लिए शराब बेचना शुरू कर दिया हालातो की वजह से मां ने शराब बेचना सही समझा। शराब लेने के लिए आने वाले लोग स्नैक्स के बदले कुछ पैसे राजेन्द्र को दे दिया करते थे।पैसे को इकट्ठा कर राजेन्द्र ने किताबें खरीदी और मन लगाकर पढ़ाई की और नतीजा यह है कि राजेन्द्र अब डॉ राजेन्द्र भारूड़ आईएएस बन चुके है। उनकी माँ ने ही उन्हें पढ़ाया और जीवन में हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। हालांकि राजेंद्र का बचपन बेहद गरीबी और कठिनाइयों भरा रहा है।

राजेंद्र ने कहा था की ‘बचपन से ही मैंने डॉक्टर बनने का सपना देखा था, ताकि मैं दूसरे लोगों की हेल्प कर सकूँ। गरीबी के कारण लोग इलाज नही करवा पाते थे। ये सब देख बचपन मे ठान लिया था कि बड़े होकर डॉक्टर बनूगा। लेकिन जैसे-जैसे मैं बड़ा हुआ, मुझे एहसास हुआ कि लोगों की मदद करने के लिए, मुझे उन्हें शिक्षित करने और बेहतर जीवन के अवसर प्रदान करने की जरूरत है। ऐसा करने के लिए मुझे एक सिविल सेवक बनना था।’

उन्होंने यूपीएससी परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी जोकि बिलकुल आसान नहीं रहा था। उन्होंने एक ऐसी दिनचर्या बनाई जो एक प्रोग्राम कंप्यूटर की तरह काम करने लगी। वह सुबह 5 बजे उठते, कुछ प्रेक्टिस या ध्यान करते, पढ़ाई शुरू करते, क्लासेज में जाते। जो समय बचता उसमे घर आकर प्रेक्टिस करते। इस तरह उन्होंने अपना पूरा ध्यान पढ़ाई में लगा दिया।

लोगो का कहना है की बिना पैसो के आपके सपने पुरे नहीं हो सकते है लेकिन राजेंद्र लोगो के लिए मिसाल है की किस तरह हालातो और गरीब से हार न मानकर उन्होंने अपने सपनो को पूरा किया बता दे की डॉ राजेंद्र भारुड एक बुक भी लिख चुके हैं जिसमें इन्होंने अपने जीवन के संघर्ष के साथ साथ अपनी मां द्वारा उसके बच्चों की परवरिश के लिए दिए गए बलिदान पर भी प्रकाश डाला है।